इनलो सुप्रीमो और पार्टी के परधन महासचिव अजय चौटाला ने दीपावली के अगली दिन अपने तेजा खेडा फार्म हाउस पे लोगो से मुलाकात की और लोगो का हाल चल पुछा अजय और उनके पिता ने लोगो को दीपावली की बधाए भी दी इस मोके आने वाले चुनाव नातेजो पर भी चर्चा हुए
देश के सबसे लंबे फ्लाईओवर पर यातायात शुरू होने के बाद शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पहुंचना आसान हो जाएगा। फ्लाईओवर पर सोमवार को आवागमन शुरू होने के बाद बहुत कम समय में हवाईअड्डे तक पहुंचा जा सकेगा। इस 11.633 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर का नाम पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नाम पर 'पीवीएनआर एक्सप्रेस वे' रखा गया है। यह फ्लाईओवर शहर के मेहदीपटनम इलाके को हैदराबाद-बेंगलुरू राष्ट्रीय राजमार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग-7) और अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से जोड़ता है। 'हैदराबाद महानगर विकास प्राधिकरण' (एचएमडीए) ने 4.39 अरब रुपये की लागत से 17.2 मीटर चौड़े फ्लाईओवर का निर्माण किया है। यह फ्लाईओवर मेहदीपटनम के 'सरोजिनी देवी आई हॉस्पीटल' से शुरू होकर राष्ट्रीय राजमार्ग-7 के 'अरामघर जंक्शन' पर समाप्त होता है। एचएमडीए के अधिकारियों का कहना है कि इस फ्लाईओवर के शुरू हो जाने से हवाईअड्डा पहुंचने में लगने वाले समय में 30 से 40 मिनट की कमी आएगी। वर्तमान में लोगों को शहर के विभिन्न इलाकों से हवाईअड्डे तक पहुंचने में 45 मिनट से एक घंटे तक का समय लगता है। वर्ष 2005 में अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की नींव रखे जाने के बाद से फ्लाईओवर की परियोजना पर काम शुरू हो गया था और हवाईअड्डा शुरू हो जाने के डेढ़ साल बाद इसका काम पूरा हुआ है।
दिल्ली में लगने वाले ट्रैफिक जाम पर हर दिन लगभग दिल्लीवासियों की जेब से 10 करोड़ रुपये और सरकार के खाते से 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सेंटर फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (CTI)ने एक सर्वे में यह बात कही है। सीटीआई ने सर्वे में कहा है- दिल्ली की सड़कों पर हर दिन करीब एक हजार नई गाड़ियां उतरती हैं। सड़कों पर पहले ही जरूरत से ज्यादा भार है लेकिन हर दिन बढ़ने वाली गाड़ियों की तादाद को रोकने का उपाय एक्सपर्टस को एक ही नज़र आता है और वह है एक ऐसा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम जिससे प्राइवट गाड़ियों वाले लोग भी इस्तेमाल कर सकें। सीटीआई के चीफ ट्रस्टी पंकज शर्मा ने कहा, सर्वे से पता चला है कि 60 लाख रजिस्टर्ड गाड़ियों में से एक तिहाई गाड़ियां सड़कों पर हैं। इनमें से हर गाड़ी पर औसतन 1.6 लीटर (2.5 लीटर कारों पर, 0.75 लीटर टू वीलर्स)ईंधन खर्च होता है। इस हिसाब से प्रतिदिन करीब 30 लाख लीटर ईंधन खर्च होता है। सर्वे के मुताबिक ट्रैफिक जाम के कारण एक व्यक्ति हर दिन 90 मिनट खर्च करता है और हर दिन करीब 10 करोड़ रुपये का ईंधन खर्च किया जाता है। चूंकि पेट्रोल-डीजल पर 15% की सरकारी सब्सिडी है इसलिए ईंधन की सब्सिडी पर सरकार के खाते से भी हर दिन 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सीटीआई ने सर्वे में दिल्ली की उन जगहों की भी पहचान की जहां सबसे ज्यादा ट्रैफिक जाम के कारण अक्सर स्थिति बेहद खराब रहती है। ये जगह हैं- खानपुर से डिफेंस कॉलनी, एमबी रोड, मूलचंद से नेहरू प्लेस, विकास मार्ग, एनएच-24, केशवपुरम से अशोक विहार, रोहतक रोड से पंजाबी बाग वाया जखीरा और ईदगाह से सब्जी मंडी। सर्वे टीम इन जगहों पर अलग-अलग समय में गाड़ियों से गुजरी और पता लगाया कि भीड़भाड़ के समय और ट्रैफिक जाम की स्थिति में औसतन कितना ईंधन खर्च होता है।
फाइव स्टार होटलों के आलीशान शौचालयों से लेकर घर-घर की जरूरत बन चुका टॉयलेट पेपर पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि साधारण कागज के लिए जितने पेड़ कटते हैं वहीं मलमल की तरह मुलायम टॉयलेट पेपर के लिए उससे कहीं अधिक संख्या में पेड़ों की कटाई होती है। पर्यावरणविदों का कहना है कि पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए टॉयलेट पेपर के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के साथ ही शौचालयों में इसके विकल्प पेश किए जाने चाहिए नहीं तो आने वाले समय में यह पर्यावरण विनाश के एक प्रमुख कारकों में शामिल होगा। पर्यावरण से जुड़े प्रतिष्ठित संगठन टेरी के वैज्ञानिक डॉ. सुनील ने इस संबंध में कहा कि भारत जैसे विशाल देश में टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल हतोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि इससे बहुत अधिक संख्या में पेड़ों की कटाई होगी और पर्यावरण संतुलन बिगड़ेगा। पर्यावरणविदों की यह भी शिकायत है कि भारत में इस संबंध में जागरूकता नहीं के बराबर है। हालांकि उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों में रिसाइक्ल्ड पेपर से बने टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यह प्रक्रिया भी आसान और पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। रिसाइक्ल्ड पेपर से पहले स्याही को साफ करके फिर उसे प्रोसेस किया जाता है लेकिन स्याही को साफ करने की इस प्रक्रिया की अपनी चुनौतियां हैं। इस प्रक्रिया में पेपर को ब्लीच करने के लिए क्लोरीन इस्तेमाल की जाती है। क्लोरीन आधारित रसायन पेपर फाइबर के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं और इससे डाइऑक्सिन और ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे विषैले पदार्थ निकलते हैं। डाइऑक्सिन लोगों में कैंसर, सीखने की क्षमता को प्रभावित करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता को घटाने और मधुमेह जैसी बीमारियों को जन्म दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण संगठन ग्रीन पीस ने पिछले दिनों अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि कोटोनेल तथा स्कॉट जैसे दो प्रमुख अमेरिकी टॉयलेट पेपर ब्रांडों के लिए 22 फीसदी पल्प कनाडा के उन जंगलों से आया जहां कुछ पेड़ दो सौ साल तक पुराने हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि टॉयलेट पेपर के लिए न केवल पेड़ों की कटाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा है बल्कि इससे उन जीव जंतुओं के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया है जो इन जंगलों में सदियों से रहते आ रहे हैं। टॉयलेट पेपर की शुरुआत की कहानी बेहद दिलचस्प है। इतिहास बताता है कि सबसे पहले 1391 में चीन में महाराजाओं के इस्तेमाल के लिए टॉयलेट पेपर बनाया गया और उसके कई सदियों बाद 1857 में जोसेफ गेटी ने सबसे पहला फैक्ट्री निर्मित टॉयलेट पेपर बाजार में पेश किया। इसके बाद 1871 में जेथ वीलर ने टॉयलेट पेपर के रोल का पेटेंट कराया। टॉयलेट पेपर के पेटेंट को लेकर भी कई अदालती लड़ाइयां लड़ी गईं और अंतत: 1894 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ओलिवर हावलेट हिक्स के पेटेंट दावे को सेथ वीलर के पक्ष में खारिज कर दिया। टॉयलेट पेपर का पश्चिमी देशों की संस्कृति में क्या स्थान है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां 26 अगस्त को टॉयलेट पेपर डे मनाया जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि 1880 से पहले टॉयलेट पेपर के स्थान पर लोग पहले पत्तों, डंडियों, रेत और कपड़े आदि का इस्तेमाल किया जाता था। लोग मल साफ करने के लिए प्राचीन समय में किन चीजों का इस्तेमाल करते थे, यह उनके पर्यावरण पर निर्भर करता था। जैसे दुनिया के उत्तरी हिस्से में रहने वाले लोग, विशेषकर एस्किमो गर्मी के मौसम में टुंड्रा घास तथा सर्दियों में बर्फ का इस्तेमाल करते थे। इसी प्रकार तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोग सीपों और नारियल के पुराने खोलों तथा अमेरिका के औपनिवेशक काल में लोग भुट्टे की खोखली डंडी, उत्तर भारत में गन्ने के लंबे छिल्के आदि का प्रयोग करते थे। यह जानकारी कुछ हास्यास्पद लग सकती है लेकिन प्राचीन रोम में इस काम के लिए एक लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था जिसके एक सिरे पर नमकीन पानी में डूबा स्पंज का टुकड़ा लगा होता था। गौरतलब है कि लगभग पूरी दुनिया में लोग एक दूसरे से दायां हाथ ही मिलाते हैं और दुनिया के पूर्वी हिस्से में लोग खाना खाने के लिए दाएं हाथ का इस्तेमाल करते हैं। बायां हाथ मिलाना जहां असभ्यता की निशानी माना जाता है वहीं छोटे बच्चों को बाएं हाथ से खाना खाने से हतोत्साहित किया जाता है और यह बात अधिकतर संस्कृतियों का हिस्सा बन चुकी है - इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि बाएं हाथ का इस्तेमाल मल साफ करने के लिए किया जाता है। यह साफ है कि प्राचीन काल के रीति रिवाजों पर 21वीं सदी में लौटना संभव नहीं है लेकिन टॉयलेट पेपर का विकल्प तलाशने की जरूरत है।
मौसम ने हवा कर दिया पटाखों का जहर
posted by Arun Singla.www.dabwalinews.blogspot.com
दीपावली के त्योहार ने इस बार रात तो रोशन की ही, हवा में जहर भी कुछ कम घोला। एयर पलूशन में पिछले साल के मुकाबले थोड़ी कमी आई है। एक्सपर्ट इसकी सबसे बड़ी वजह मौसम की मेहरबानी को मान रहे हैं। हालांकि पटाखों के शोर ने परेशान किया। दोनों तरह के पलूशन का सबसे ज्यादा असर रात 9 से 12 बजे के बीच रहा, यानी दिल्ली सरकार का 10 बजे के बाद पटाखे नहीं जलाने की चेतावनी का दिल्लीवालों पर कोई असर नहीं पड़ा। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक एयर पलूशन के मामले में थोड़ी राहत मिली है, क्योंकि सल्फर डाई ऑक्साइड को छोड़कर बाकी कंटेंट में पिछले साल के मुकाबले कमी दर्ज की गई है। सीपीसीबी की स्टडी के मुताबिक ऐसा हल्के और इंपोर्टड पटाखों में सल्फर डाई ऑक्साइड का इस्तेमाल बढ़ने के कारण हुआ है। सीपीसीबी के डायरेक्टर डॉ. एस. डी. मखीजनी ने बताया कि इस बार हवा में एसपीएम, आरएसपीएम और एनओ-टू में कमी की सबसे बड़ी वजह मौसम की मेहरबानी रही है। दीपावली के दिन तापमान 25.2 डिग्री दर्ज किया गया है, जबकि पिछले साल यह 24.5 डिग्री दर्ज हुआ था। साथ ही हवा की गति भी पिछले साल 0.13 के मुकाबले इस बार 0. 20 रही है। इसी तरह से हवा में नमी की मात्रा भी पिछले साल के 60.8 फीसदी के मुकाबले इस बार 49.8 फीसदी रही है। यही वजह है कि इस बार पटाखों के प्रदूषण का बड़ा हिस्सा हवा के साथ पृथ्वी के सर्फेस एरिया से काफी ऊपर चला गया। रिपोर्ट के मुताबिक पीतमपुरा को छोड़कर हर जगह सल्फर डाई ऑक्साइड की मात्रा पिछले साल के मुकाबले बढ़ी है। पिछले साल इसका कंसंट्रेशन लेवल 7 से 24 के बीच था, जबकि इस बार यह 8 से 42 के बीच दर्ज हुआ है। एयर पलूशन के बाकी कंटेंट - नाइट्रोजन ऑक्साइड, सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर और रेस्पिरेबल सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर की मात्रा में कमी आई है। सीपीसीबी ने दीपावली की रात दिल्ली के सात इलाकों- आईटीओ, पीतमपुरा, सीरीफोर्ट, जनकपुरी, निजामुद्दीन, शहजादाबाग और शाहदरा स्टेशनों में एयर पलूशन की मात्रा को हर घंटे रेकॉर्ड किया। दिल्ली के नौ में से तीन लोकेशन में नॉयज पलूशन बढ़ा है, एक लोकेशन पर इसमें कमी आई है और बाकी जगह पिछले साल जितना ही रहा है। हालांकि, अधिकतम ध्वनि सीमा इस बार 82 डेसिबल ही रही है, जबकि पिछले साल इसका स्तर 85 डेसिबल दर्ज हुआ था। नॉयज पलूशन को आंकने के लिए नौ जगहों- लाजपत नगर, ईस्ट अर्जुन नगर, मयूर विहार फेज-दो, पीतमपुरा, कमला नगर, दिलशाद गार्डन, अंसारी नगर, कनॉट प्लेस और आईटीओ में स्टेशन बनाए गए थे।

