उन्होंने अपनी सारी पूंजी को इन्वेस्ट कर बेटों को विदेश में कमाई करने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि विदेश में की गई कमाई उनकी सात पुश्तों तक के दुख-दर्द दूर कर देगी। उनके बेटे लौटे तो, लेकिन सिर्फ कलश भर अस्थियों के रूप में। अपने बेटों के लौटने के बाद जिन खुशगवार पलों को जीने के सपने संजोए थे, वे चकनाचूर भी हो गए। उसी के बिखरे टुकड़े अब उनकी आंखों में चुभते हैं। फरीदकोट जिले के गांव मचाकी कलां के दो परिवारों ने अपने बेटों को विदेश में खो दिया और आखिरी समय में उनकी एक झलक भी न पा सके। विदेश में मौत का शिकार हुए बच्चों को याद कर बूढ़ी आंखें अपने बाकी बचे परिवार के पालन-पोषण का जुगाड़ करने में शून्य में ताकती रहती हैं। गुरमीत कौर के पति की मौत काफी पहले ही हो गई थी। उसने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर कड़ी मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण किया। इस दौरान बड़े बेटे जसप्रीत सिंह ने विदेश जाने की ठानी तो गुरमीत ने अपनी चार एकड़ जमीन गिरवी रखकर बेटे को मनीला भेज दिया। स्थायी काम हासिल करने के लिए जसप्रीत ने वहां एक अनिवासी पंजाबी लड़की खुशवीर से शादी रचा ली। बीवी के हाथों की मेंहदी अभी अपने यौवन पर थी कि वहां कुछ लुटेरों ने जसप्रीत को गोलियों से छलनी कर दिया। बेटे की मौत के बाद गांव में मानो परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने बच्चे की लाश को अपनी धरती पर लाकर अंतिम संस्कार कर सकें। कुछ ही दिन बाद उसकी बहू हाथ में अस्थि कलश लिए एक विधवा के रूप में उनके सामने आ खड़ी हुई। अब यह परिवार अपनी गिरवी जमीन बचाने के लिए घर में रखी भैंसों का दूध बेचकर काम चला रहा है। इस काम में जसप्रीत का छोटा भाई जी जान से जुटा हुआ है। ऐसा ही कुछ हाल है इसी गांव के जसविंदर कौर के परिवार का। उसका बेटा भी पैसा कमाने विदेश गया था। उसे विदेश भेजने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी। पैसे कम पड़े तो ब्याज पर पैसा उठा लिया। उसको उम्मीद थी कि बेटे को विदेश में काम मिलते ही सारा कर्ज एक ही झटके में उतर जाएगा। तकदीर को यह मंजूर नहीं था। जसपाल सिंह भी मनीला ही गया था। कुछ समय वहां काम करने के बाद किसी बीमारी से उसकी मौत हो गई। कई दिनों की मेहनत के बाद परिवार को अपने बेटे की लाश का मुंह देखना नसीब हुआ। बेटे की निशानी के तौर पर इस परिवार के पास उसका भेजा एक टेलीविजन सेट और डीवीडी प्लेयर ही हैं। जसविंदर का परिवार अब एक कच्चे मकान में दिन काट रहा है।
उन्होंने अपनी सारी पूंजी को इन्वेस्ट कर बेटों को विदेश में कमाई करने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि विदेश में की गई कमाई उनकी सात पुश्तों तक के दुख-दर्द दूर कर देगी। उनके बेटे लौटे तो, लेकिन सिर्फ कलश भर अस्थियों के रूप में। अपने बेटों के लौटने के बाद जिन खुशगवार पलों को जीने के सपने संजोए थे, वे चकनाचूर भी हो गए। उसी के बिखरे टुकड़े अब उनकी आंखों में चुभते हैं। फरीदकोट जिले के गांव मचाकी कलां के दो परिवारों ने अपने बेटों को विदेश में खो दिया और आखिरी समय में उनकी एक झलक भी न पा सके। विदेश में मौत का शिकार हुए बच्चों को याद कर बूढ़ी आंखें अपने बाकी बचे परिवार के पालन-पोषण का जुगाड़ करने में शून्य में ताकती रहती हैं। गुरमीत कौर के पति की मौत काफी पहले ही हो गई थी। उसने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर कड़ी मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण किया। इस दौरान बड़े बेटे जसप्रीत सिंह ने विदेश जाने की ठानी तो गुरमीत ने अपनी चार एकड़ जमीन गिरवी रखकर बेटे को मनीला भेज दिया। स्थायी काम हासिल करने के लिए जसप्रीत ने वहां एक अनिवासी पंजाबी लड़की खुशवीर से शादी रचा ली। बीवी के हाथों की मेंहदी अभी अपने यौवन पर थी कि वहां कुछ लुटेरों ने जसप्रीत को गोलियों से छलनी कर दिया। बेटे की मौत के बाद गांव में मानो परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने बच्चे की लाश को अपनी धरती पर लाकर अंतिम संस्कार कर सकें। कुछ ही दिन बाद उसकी बहू हाथ में अस्थि कलश लिए एक विधवा के रूप में उनके सामने आ खड़ी हुई। अब यह परिवार अपनी गिरवी जमीन बचाने के लिए घर में रखी भैंसों का दूध बेचकर काम चला रहा है। इस काम में जसप्रीत का छोटा भाई जी जान से जुटा हुआ है। ऐसा ही कुछ हाल है इसी गांव के जसविंदर कौर के परिवार का। उसका बेटा भी पैसा कमाने विदेश गया था। उसे विदेश भेजने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी। पैसे कम पड़े तो ब्याज पर पैसा उठा लिया। उसको उम्मीद थी कि बेटे को विदेश में काम मिलते ही सारा कर्ज एक ही झटके में उतर जाएगा। तकदीर को यह मंजूर नहीं था। जसपाल सिंह भी मनीला ही गया था। कुछ समय वहां काम करने के बाद किसी बीमारी से उसकी मौत हो गई। कई दिनों की मेहनत के बाद परिवार को अपने बेटे की लाश का मुंह देखना नसीब हुआ। बेटे की निशानी के तौर पर इस परिवार के पास उसका भेजा एक टेलीविजन सेट और डीवीडी प्लेयर ही हैं। जसविंदर का परिवार अब एक कच्चे मकान में दिन काट रहा है।
मिनी ल्हासा यानी मैक्लोडगंज। वही, जहां साठ के दशक में तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा बसे थे। जहां निर्वासित तिब्बत सरकार का मुख्यालय व दलाईलामा के होने के कारण असंख्य विदेशी-देशी श्रद्धालु आते हैं। इन्हें शांति भी चाहिए और ज्ञान भी। लेकिन उनकी इसी भूख को आर्थिक उत्थान का औजार बनाते हुए मैक्लोडगंज व भागसूनाग सहित आसपास के क्षेत्रों में ध्यान, योग, रेकी व मसाज सहित कई तरह की चिकित्सा से जुड़े केंद्र शुरू हो गए हैं। केंद्र कर रहे हैं कमाई : इन केंद्रों के जरिए विदेशियों की सत्य की खोज व ज्ञान की प्यास कम हो या न हो, लेकिन संचालकों की मोटी कमाई जरूर हो रही है। ये केंद्र पूरा साल नहीं, बल्कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या के अनुसार खुलते हैं व पर्यटकों का ग्राफ कम होते ही बंद हो जाते हैं। विदेशी पर्यटकों को रिझाने के लिए इनके संचालक केवल पोस्टरों व इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं। पोस्टरों से अटी दीवारें : मैक्लोडगंज व भागसूनाग में ऐसे केंद्रों के संचालकों ने पोस्टरों के जरिए पूरे मैक्लोडगंज को बदरंग कर दिया है। इन केंद्रों का सबसे अधिक संचालन भारत के दक्षिण राज्यों से आने वाले लोग कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ विदेशी व तिब्बती भी इनका संचालन कर रहे हैं। लव मेडिटेशन, शिवा हीलिंग : ध्यान की अगर बात करें, तो ध्यान को इतने कोर्सो में बांट दिया गया है कि इसके बारे में शायद ध्यान का कोई बेहतरीन ज्ञाता भी न जानता हो। ध्यान की कुछ विद्याओं को शिवा हीलिंग तो कुछ विद्याओं को लव मेडिटेशन, ड्रीम मेडिटेशन सहित कई दर्जनों नाम दे दिए गए हैं। यही हाल योग का भी है। इसके अलावा इस धार्मिक नगरी में कुकिंग कोर्स व म्यूजिक क्लासों को भी पूरा जोर है। अगर इनके कोर्सो की फीस की बात करें, तो योग क्लासों की न्यूनतम फीस 18 सौ रुपये से शुरू होकर दस हजार रुपये तक है। इनमें सात दिन, पंद्रह दिन व एक माह के कोर्स है। ध्यान व रेकी (स्पर्श चिकित्सा) कोर्सो के लिए भी फीस इतनी ही है। कुकिंग कोर्स की कक्षा करीब एक माह तक चलती है व एक घंटे के यहां पांच सौ रुपये तक का दाम रहता है। फुल बॉडी मसाज का भी यहां दो घंटे का पांच सौ रुपये वसूला जाता है तथा इनमें अधिकतर विदेशी पर्यटकों को ही शामिल किया जाता हैं तथा उनसे फीस भी डालर के रूप में वसूली जाती है। इन केंद्रों का जाल मैक्लोडगंज शहर में कम है। भागसूनाग, धर्मकोट सहित आसपास के क्षेत्र में इस समय ही करीब सौ ऐसे केंद्र कार्य कर रहे हैं। संचालक इनको अधिकतर घरों या होटलों में कमरे लेकर चला रहे हैं। एक केंद्र कमा जाता है एक से दो लाख : एक माह की बात करें, तो एक केंद्र का संचालक एक से दो लाख रुपये कमाता है। इन केंद्रों के बीच कुछ बेहतरीन केंद्र भी है तथा इनमें फीस की जगह केवल डोनेशन का प्रावधान है लेकिन इनकी संख्या कम है। सरकार का नहीं ध्यान : पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग मानते हैं कि हिमाचल अब विश्व में ध्यान व योग का हब बनने लगा है। इसका यहां कारोबार करोड़ों में पहुंच चुका है। हाथ देखने की कई विद्याओं व रेकी के सहारे भी यहां योग साहित्य व ध्यान सीडी की बिक्री भी अलग से हो रही है। ताज्जुब की बात है कि यहां यह कारोबार तो बढ़ रहा है, लेकिन इस पर प्रदेश सरकार या पर्यटन विभाग का कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष नियंत्रण नहीं है। इससे यहां हिमाचल के लोगों की जगह बाहर के लोग ही सबसे अधिक चांदी कूट रहे हैं तथा सरकार को भी कुछ नहीं मिल रहा है।
घोर कलियुग! किसानों की मेहनत को उल्टा-पुल्टा करने वाले बंदरों ने अब वह कहावत भी पलट दी है, जिसमें कहा जाता था कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। हिमाचल में बंदरों ने अदरक का स्वाद भी चख लिया है। राज्य की चार लाख के करीब वानर सेना सेब की कायल तो थी ही, हरी सब्जियों में किन्नौर का मीठा मटर भी बंदरों का पसंदीदा व्यंजन बन गया है। और तो और भोजन को तीखा करने की इनकी आदत भी मानव की तरह हो गई है। खाने में हरी मिर्च भी बंदरों की पसंद बन चुकी है। वानरों की बढ़ती सेना ने जैसे-जैसे प्रदेश के खेतों में हमला बढ़ा दिया है वैसे-वैसे राज्य के किसान कंगाली की हालत में पहुंच गए हैं। अब हालत यह है कि बंदरों को तो प्रोटीन व विटामिन युक्त भोजन मिल रहा है, लेकिन पहाड़ों के किसानों के बच्चे खाली हैं। पानी सिर से ऊपर चढ़ता देख सोमवार को शिमला में प्रदेशभर से किसानों ने मोर्चा खोला और इकट्ठे होकर सरकार के समक्ष फरियाद लगाने पहुंचे हैं। सभी किसान खेती बचाओ जन संघर्ष समिति बनाकर सरकार से हल मांग रहे हैं। बंदरों के कारण सबसे ज्यादा खराब हालत सिरमौर जिले की है। इस जिले में गुठलीदार फलों के अलावा अदरक व लहसुन की सबसे अधिक फसल होती है। नौराधार क्षेत्र के हरट गांव के जीत सिंह कहते हैं- आज से चार वर्ष पहले मैं खेत में 12 हजार रुपये का अदरक का बीज बोता था तो मुझे तीन गुणा से ज्यादा और कभी 50 हजार रुपये तक कमाई हो जाती थी। लेकिन इस साल बंदर सारा अदरक चट कर गए और मुझे केवल तीन हजार रुपये की ही वसूली हो पाई। वहीं सोलन जिले में मिर्च की फसल भी बंदरों को भा गई है। खट्टे टमाटरों के साथ हरी मिर्च के चटकारे किसानों की सिरदर्दी बन गई है। वन विभाग ने हाल ही में सिरमौर जिले में बंदरों द्वारा फसलें चट करने का सर्वेक्षण करवाया तो पता चला कि ग्राम पंचायत देवना व भूप्ली मानल में क्रमवार 43 लाख व 46 लाख रुपये की फसलों को नुकसान पहुंचाया है।
आस्ट्रेलिया में भारतीय पर फिर नस्ली हमला
सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले थम नहीं रहे हैं। यहां रविवार को बस स्टैंड पर सो रहे सिख युवक पर दो युवकों ने ने हमला बोल दिया। दोनों हमलावरों ने युवक की पगड़ी उतार दी और उसके सिर पर प्रहार किए। पुलिस ने कहा कि 22 वर्षीय भारतीय युवक पर हुए हमले की जांच की जा रही है। हालांकि युवक के नाम व अन्य विवरण का पता नहीं चल सका है। द ऐज अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को मेलबर्न के एपिंग रेलवे स्टेशन के पास कूपर स्ट्रीट स्थित बस स्टैंड पर युवक सोया हुआ था। दोपहर को यहां आई एक बस से पांच युवक उतरे। इनमें से दो ने भारतीय युवक पर हमला कर दिया। जबकि उनके तीन अन्य साथियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। 60 वर्षीय बस ड्राइवर और एक अन्य यात्री ने भी दोनों हमलावरों को रोकने की कोशिश की। वारदात के बाद पांचों युवक मौके से भाग गए। रिपोर्ट के मुताबिक पीडि़त युवक के मुंह पर चोट आई है, लेकिन उसे अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं है। पुलिस ने घटना के प्रत्यक्षदर्शियों से सामने आने और बयान देने की अपील की है।
हरियाणा के तेज विकास और शांति के लिए वैसा ही इरादा : हुड्डा -----------------------
अभियान से पहले दबाव की राजनीति
नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक जंग का वक्त नजदीक आने के साथ ही राजनीतिज्ञों व बुद्धिजीवियों ने केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ लामबंदी तेज कर दी है। बुद्धिजीवी तो कोलकाता से लेकर दिल्ली तक केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं, मगर अभियान के लिए असली खतरा फिर पश्चिम बंगाल ही बन रहा है। नक्सलियों के खिलाफ सामूहिक अभियान में पहले राज्य की वामपंथी सरकार बाधक थी तो इस बार कांग्रेस की सहयोगी ममता बनर्जी की राजनीति ही केंद्र के आड़े आ रही है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की चिदंबरम के साथ बढ़ती नजदीकी या नक्सलियों के खिलाफ सामूहिक अभियान के लिए केंद्र व राज्य सरकार के बीच बन रही केमिस्ट्री ममता को बेचैन किए हुए है। वह तो शुरू से ही नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक अभियान के विरोध में थीं, लेकिन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम के अडिग रवैये के चलते वह शोर मचाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकीं। मगर बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के पुलिस अधिकारी और माओवादियों की अदला-बदली प्रकरण और इस दौरान चली राजनीति से ममता को ताकत मिल गई। इस बीच नक्सलियों द्वारा अपहृत दो पुलिस वालों के मुद्दे पर बुद्धदेव के विरोधाभासी बयानों के बाद तो ममता को फिर केंद्र पर दबाव बनाने का मौका मिल गया है। अब वह मंगलवार को पुलिस के दोनों अपहृत सिपाहियों- साबिर अली मुल्ला और कंचन गोड़ई के परिवार वालों के साथ गृहमंत्री चिदंबरम से मुलाकात करेंगी। उनकी मांग तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की होगी, लेकिन वास्तविक एजेंडा पश्चिम बंगाल से अर्द्धसैनिक बल कम करने और माओवादियों के खिलाफ अभियान रोकने का होगा। यह भी अजीब स्थिति है कि पहले सामूहिक अभियान में बाधक बनी रही पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार जब पूरी तरह केंद्र के साथ है तो अब संप्रग की सहयोगी तृणमूल बाधा खड़ी कर रही है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी की बात सुनने में तो पूरी तवज्जो दी जाएगी, लेकिन नक्सलियों के खिलाफ अभियान में जरा भी ढील नहीं बरती जाएगी। यद्यपि, वे भी मान रहे हैं कि ममता के साथ-साथ बुद्धिजीवियों ने जिस तरह से सरकार के खिलाफ बौद्धिक जेहाद छेड़ा है, उससे सरकार पर दबाव बनने का खतरा तो बढ़ा ही है। दरअसल, नक्सलियों की नृशंस व क्रूर करतूतों के बावजूद उनके हमदर्द बुद्धिजीवियों को केंद्र सरकार अपने पक्ष में नहीं ला सकी है। पीयूसीएल ने तो दिल्ली में सभा कर केंद्र सरकार को फासिस्ट करार दिया और इस अभियान के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। पीयूसीएल की सभा में बुद्धिजीवियों ने न सिर्फ केंद्र बल्कि सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर चल रहे हैं जिनकी नजर भारत की खनिज संपदा पर है। इसीलिए, केंद्र लोगों की समस्या दूर करने के बजाय उनको मारने की योजना बना रही है।
हमेशा खुद को फक्कड़ बताकर चंदा जुगाड़ने की फिराक में रहने वाली राजनीतिक पार्टियों की बातों में न आएं। न ही सादगी और बचत के इनके दिखावों पर जाएं। इन पार्टियों की अंटी में खूब माल है और शाहखर्ची में भी ये किसी कंपनी से पीछे नहीं। देश की सात राष्ट्रीय पार्टियों की कुल संपत्ति आठ सौ करोड़ से भी ज्यादा है। इसमें भी सिर्फ जमीन-जायदाद यानी अचल संपत्ति की बात की जाए तो 35 करोड़ के साथ साम्यवादी विचारधारा वाली माकपा ही सबसे आगे है। राष्ट्रीय पार्टियों की संपत्ति का जायजा लें तो इन दिनों सादगी अभियान चला रही कांग्रेस पार्टी के पास 340 करोड़ रुपये का माल-मत्ता है। सीटों और वोटों के मामले में नंबर दो भाजपा 177 करोड़ रुपये की मालिक है। इसी तरह मायावती की बसपा के पास 118 करोड़ रुपये की संपत्ति है। वर्ग संघर्ष की बात करने वाली माकपा भी पीछे नहीं है। बैलेंस शीट के मुताबिक इसकी परिसंपत्ति 157 करोड़ रुपये है। ये आंकड़े पार्टियों के सालाना आयकर रिटर्न पर आधारित हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर ये पार्टियां कागजों पर इतनी घोषणा करती है तो वाकई इनके पास कितना माल होगा। दैनिक जागरण ने आरटीआई के जरिये जो जानकारी जुटाई है उसके मुताबिक चुनाव आयोग में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, माकपा, भाकपा, राजद और राकांपा ने साल 2008-09 के लिए अपने रिटर्न में अपनी जो परिसंपत्ति बताई है, वो कुल मिला कर 811 करोड़ है। अब यदि बात की जाए अचल संपत्ति यानी जमीन-जायदाद की तो हमेशा पूंजी के खिलाफ खड़ी दिखाई देने वाली माकपा गर्व के साथ नंबर एक पर खड़ी है। इसके बाद 31 करोड़ की अचल जायदाद के साथ भाजपा है और फिर 25 करोड़ रुपये के साथ कांग्रेस। पार्टी फंड का ब्योरा बताता है कि इसमें कार्यकर्ताओं का योगदान मामूली होता है। 2007-08 के दौरान इनकी कुल कमाई में कार्यकर्ताओं का योगदान सिर्फ पांच फीसदी रहा। इनमें सबसे समर्पित बसपा कार्यकर्ता दिखे। बाकी सभी पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने मिला कर जितना सदस्यता शुल्क दिया, उससे छह गुना अकेले बसपायों ने दे दिया। बसपा को सदस्यता शुल्क से 20 करोड़ 50 लाख रुपये मिले, जबकि कांग्रेस को सवा दो करोड़ और भाजपा को सिर्फ डेढ़ करोड़।
Bhupinder Singh Hooda to Prove Majority By 31 October in Haryana Assembly
Chandigarh (Arun singla): Haryana Governor Jagannath Pahadia has given one week’s time to Haryana CM Bhupinder Singh Hooda to prove majority on the floor of the house.Addressing a press conference after taking oath, Bhupinder Singh Hooda said that his party had support of seven independent MLAs and one MLA of BSP had also extended his support to the Congress.When asked about Haryana Janhit Congress (BL) joining hands with the Congress, he said that the members of HJC were part of the Congress family, but somehow they had they had parted away. Now if they give unconditional support, the Congress would welcome them.
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