Posted in October 27, 2009
by arun singla


बंदरों को भाया अदरक का स्वाद
घोर कलियुग! किसानों की मेहनत को उल्टा-पुल्टा करने वाले बंदरों ने अब वह कहावत भी पलट दी है, जिसमें कहा जाता था कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद। हिमाचल में बंदरों ने अदरक का स्वाद भी चख लिया है। राज्य की चार लाख के करीब वानर सेना सेब की कायल तो थी ही, हरी सब्जियों में किन्नौर का मीठा मटर भी बंदरों का पसंदीदा व्यंजन बन गया है। और तो और भोजन को तीखा करने की इनकी आदत भी मानव की तरह हो गई है। खाने में हरी मिर्च भी बंदरों की पसंद बन चुकी है। वानरों की बढ़ती सेना ने जैसे-जैसे प्रदेश के खेतों में हमला बढ़ा दिया है वैसे-वैसे राज्य के किसान कंगाली की हालत में पहुंच गए हैं। अब हालत यह है कि बंदरों को तो प्रोटीन व विटामिन युक्त भोजन मिल रहा है, लेकिन पहाड़ों के किसानों के बच्चे खाली हैं। पानी सिर से ऊपर चढ़ता देख सोमवार को शिमला में प्रदेशभर से किसानों ने मोर्चा खोला और इकट्ठे होकर सरकार के समक्ष फरियाद लगाने पहुंचे हैं। सभी किसान खेती बचाओ जन संघर्ष समिति बनाकर सरकार से हल मांग रहे हैं। बंदरों के कारण सबसे ज्यादा खराब हालत सिरमौर जिले की है। इस जिले में गुठलीदार फलों के अलावा अदरक व लहसुन की सबसे अधिक फसल होती है। नौराधार क्षेत्र के हरट गांव के जीत सिंह कहते हैं- आज से चार वर्ष पहले मैं खेत में 12 हजार रुपये का अदरक का बीज बोता था तो मुझे तीन गुणा से ज्यादा और कभी 50 हजार रुपये तक कमाई हो जाती थी। लेकिन इस साल बंदर सारा अदरक चट कर गए और मुझे केवल तीन हजार रुपये की ही वसूली हो पाई। वहीं सोलन जिले में मिर्च की फसल भी बंदरों को भा गई है। खट्टे टमाटरों के साथ हरी मिर्च के चटकारे किसानों की सिरदर्दी बन गई है। वन विभाग ने हाल ही में सिरमौर जिले में बंदरों द्वारा फसलें चट करने का सर्वेक्षण करवाया तो पता चला कि ग्राम पंचायत देवना व भूप्ली मानल में क्रमवार 43 लाख व 46 लाख रुपये की फसलों को नुकसान पहुंचाया है।