Posted in November 17, 2009
by arun singla


मैं भगवान नहीं : तेंदुलकर
मैंने ईश्वर को देखा है। वह भारत की तरफ से चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करता है। क्रिकेट के शहंशाह सचिन तेंदुलकर पर यह टिप्पणी किसी आम आदमी ने नहीं बल्कि आस्ट्रेलिया के पूर्व दिग्गज सलामी बल्लेबाज मैथ्यू हेडेन ने की थी। तब से मास्टर बल्लेबाज को क्रिकेट का भगवान की उपाधि दे दी गई। इसके बाद भी कई पूर्व व वर्तमान खिलाडि़यों ने सचिन को भगवान के समकक्ष बताया। मगर खुद सचिन इस बात से विनम्रता से इनकार करते हुए कहते हैं कि मैं भगवान नहीं हूं। मुझे बस लोगों का अपार प्यार मिलता है और मुझे भारत की ओर से खेलना बेहद पसंद है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में रविवार को 20 साल पूरे करने वाले तेंदुलकर ने कहा कि मुझे बहुत खुशी होती है कि इतने अधिक लोग मेरे करियर का अनुसरण करते हैं। मैं भी इंसान हूं, लेकिन मेरे पीछे एक बड़ी शक्ति, बड़ी टीम है। मेरे साथी खिलाड़ी, परिवार, बच्चे, दोस्त और प्रशंसक हैं। मैं जब बल्लेबाजी के लिए क्रीज पर जाता हूं तो मैं उनकी तरफ से खेलता हूं। तेंदुलकर ने अपने करियर में बल्लेबाजी के कई रिकार्ड तोड़े, लेकिन इस दौरान दो बार उन्हें लगा कि उनका करियर समाप्त हो गया है। ठीक 20 साल पहले 15 नवंबर 1989 को कराची में खेले गए अपने पहले टेस्ट मैच के बारे में इस स्टार बल्लेबाज ने कहा कि पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ पहले टेस्ट के बाद मुझे ऐसा लगा। मैंने केवल 15 रन बनाए और मैंने सोचा कि क्या मुझे अगले मैच में खेलने का मौका मिलेगा, लेकिन मुझे यह मौका मिला। जब मैंने दूसरे मैच में 58 या 59 रन बनाए तो मुझे बड़ी राहत मिली। दूसरी बार तब जब मैं टेनिस एल्बो चोट से पीडि़त था। यह बहुत मुश्किल समय था। मैं रात को सो नहीं पाता था और मुझे लगा कि मेरा करियर समाप्त हो गया है। तेंदुलकर ने पिछले साल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ 140 रन की मैच विजेता पारी को आस्ट्रेलियाई तेज आक्रमण के खिलाफ पर्थ में 1991 में खेली गई 119 रन की पारी से ऊपर रखा क्योंकि यह शतक उन्होंने मुंबई आतंकी हमले के बाद लगाया था। उन्होंने कहा कि मैं कह सकता हूं कि पर्थ की पारी मेरी चोटी की पारियों में शामिल है। लेकिन पिछले साल चेन्नई में मैंने जो पारी खेली वह सभी से ऊपर है क्योंकि इस मैच से कुछ दिन पहले मुंबई में भयावह घटना घटी थी। इसकी भरपाई नहीं की जा सकती, लेकिन इस जीत से हम कुछ पलों के लिए उनका ध्यान बांटने में सफल रहे। तेंदुलकर से जब पूछा गया कि क्या उनका पुत्र अर्जुन भी उनके नक्शेकदम पर चलकर क्रिकेट खेलेगा, उन्होंने कहा कि वह अभी दस साल का है और मैं उस पर क्रिकेट खेलने का दबाव नहीं डालूंगा। यदि उसे क्रिकेट खेलनी है तो पहले उसे इस खेल को अपने दिल में बसाना होगा तेंदुलकर और फिर इसके बारे में सोचना होगा। यह बात सिर्फ अर्जुन ही नहीं बल्कि सभी युवाओं पर लागू होती है। कप्तानी के बारे में उन्होंने कहा कि मुझे कभी नहीं लगा कि यह बोझ है। निश्चित तौर पर देश की कप्तानी करना सम्मान है। यह अलग तरह का अनुभव है। हमने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच जीता। टाइटन कप जीता और टोरंटो में पाकिस्तान को हराया, लेकिन वेस्टइंडीज के खिलाफ बारबडोस में 120 रन का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए। मैंने इस दौर का भी लुत्फ उठाया और इससे काफी कुछ सीखा।