आस्ट्रेलिया में भारतीय पर फिर नस्ली हमला
सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर नस्ली हमले थम नहीं रहे हैं। यहां रविवार को बस स्टैंड पर सो रहे सिख युवक पर दो युवकों ने ने हमला बोल दिया। दोनों हमलावरों ने युवक की पगड़ी उतार दी और उसके सिर पर प्रहार किए। पुलिस ने कहा कि 22 वर्षीय भारतीय युवक पर हुए हमले की जांच की जा रही है। हालांकि युवक के नाम व अन्य विवरण का पता नहीं चल सका है। द ऐज अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को मेलबर्न के एपिंग रेलवे स्टेशन के पास कूपर स्ट्रीट स्थित बस स्टैंड पर युवक सोया हुआ था। दोपहर को यहां आई एक बस से पांच युवक उतरे। इनमें से दो ने भारतीय युवक पर हमला कर दिया। जबकि उनके तीन अन्य साथियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। 60 वर्षीय बस ड्राइवर और एक अन्य यात्री ने भी दोनों हमलावरों को रोकने की कोशिश की। वारदात के बाद पांचों युवक मौके से भाग गए। रिपोर्ट के मुताबिक पीडि़त युवक के मुंह पर चोट आई है, लेकिन उसे अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं है। पुलिस ने घटना के प्रत्यक्षदर्शियों से सामने आने और बयान देने की अपील की है।
हरियाणा के तेज विकास और शांति के लिए वैसा ही इरादा : हुड्डा -----------------------
अभियान से पहले दबाव की राजनीति
नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक जंग का वक्त नजदीक आने के साथ ही राजनीतिज्ञों व बुद्धिजीवियों ने केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ लामबंदी तेज कर दी है। बुद्धिजीवी तो कोलकाता से लेकर दिल्ली तक केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं, मगर अभियान के लिए असली खतरा फिर पश्चिम बंगाल ही बन रहा है। नक्सलियों के खिलाफ सामूहिक अभियान में पहले राज्य की वामपंथी सरकार बाधक थी तो इस बार कांग्रेस की सहयोगी ममता बनर्जी की राजनीति ही केंद्र के आड़े आ रही है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की चिदंबरम के साथ बढ़ती नजदीकी या नक्सलियों के खिलाफ सामूहिक अभियान के लिए केंद्र व राज्य सरकार के बीच बन रही केमिस्ट्री ममता को बेचैन किए हुए है। वह तो शुरू से ही नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक अभियान के विरोध में थीं, लेकिन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम के अडिग रवैये के चलते वह शोर मचाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकीं। मगर बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के पुलिस अधिकारी और माओवादियों की अदला-बदली प्रकरण और इस दौरान चली राजनीति से ममता को ताकत मिल गई। इस बीच नक्सलियों द्वारा अपहृत दो पुलिस वालों के मुद्दे पर बुद्धदेव के विरोधाभासी बयानों के बाद तो ममता को फिर केंद्र पर दबाव बनाने का मौका मिल गया है। अब वह मंगलवार को पुलिस के दोनों अपहृत सिपाहियों- साबिर अली मुल्ला और कंचन गोड़ई के परिवार वालों के साथ गृहमंत्री चिदंबरम से मुलाकात करेंगी। उनकी मांग तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की होगी, लेकिन वास्तविक एजेंडा पश्चिम बंगाल से अर्द्धसैनिक बल कम करने और माओवादियों के खिलाफ अभियान रोकने का होगा। यह भी अजीब स्थिति है कि पहले सामूहिक अभियान में बाधक बनी रही पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार जब पूरी तरह केंद्र के साथ है तो अब संप्रग की सहयोगी तृणमूल बाधा खड़ी कर रही है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी की बात सुनने में तो पूरी तवज्जो दी जाएगी, लेकिन नक्सलियों के खिलाफ अभियान में जरा भी ढील नहीं बरती जाएगी। यद्यपि, वे भी मान रहे हैं कि ममता के साथ-साथ बुद्धिजीवियों ने जिस तरह से सरकार के खिलाफ बौद्धिक जेहाद छेड़ा है, उससे सरकार पर दबाव बनने का खतरा तो बढ़ा ही है। दरअसल, नक्सलियों की नृशंस व क्रूर करतूतों के बावजूद उनके हमदर्द बुद्धिजीवियों को केंद्र सरकार अपने पक्ष में नहीं ला सकी है। पीयूसीएल ने तो दिल्ली में सभा कर केंद्र सरकार को फासिस्ट करार दिया और इस अभियान के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। पीयूसीएल की सभा में बुद्धिजीवियों ने न सिर्फ केंद्र बल्कि सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर चल रहे हैं जिनकी नजर भारत की खनिज संपदा पर है। इसीलिए, केंद्र लोगों की समस्या दूर करने के बजाय उनको मारने की योजना बना रही है।
हमेशा खुद को फक्कड़ बताकर चंदा जुगाड़ने की फिराक में रहने वाली राजनीतिक पार्टियों की बातों में न आएं। न ही सादगी और बचत के इनके दिखावों पर जाएं। इन पार्टियों की अंटी में खूब माल है और शाहखर्ची में भी ये किसी कंपनी से पीछे नहीं। देश की सात राष्ट्रीय पार्टियों की कुल संपत्ति आठ सौ करोड़ से भी ज्यादा है। इसमें भी सिर्फ जमीन-जायदाद यानी अचल संपत्ति की बात की जाए तो 35 करोड़ के साथ साम्यवादी विचारधारा वाली माकपा ही सबसे आगे है। राष्ट्रीय पार्टियों की संपत्ति का जायजा लें तो इन दिनों सादगी अभियान चला रही कांग्रेस पार्टी के पास 340 करोड़ रुपये का माल-मत्ता है। सीटों और वोटों के मामले में नंबर दो भाजपा 177 करोड़ रुपये की मालिक है। इसी तरह मायावती की बसपा के पास 118 करोड़ रुपये की संपत्ति है। वर्ग संघर्ष की बात करने वाली माकपा भी पीछे नहीं है। बैलेंस शीट के मुताबिक इसकी परिसंपत्ति 157 करोड़ रुपये है। ये आंकड़े पार्टियों के सालाना आयकर रिटर्न पर आधारित हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर ये पार्टियां कागजों पर इतनी घोषणा करती है तो वाकई इनके पास कितना माल होगा। दैनिक जागरण ने आरटीआई के जरिये जो जानकारी जुटाई है उसके मुताबिक चुनाव आयोग में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, माकपा, भाकपा, राजद और राकांपा ने साल 2008-09 के लिए अपने रिटर्न में अपनी जो परिसंपत्ति बताई है, वो कुल मिला कर 811 करोड़ है। अब यदि बात की जाए अचल संपत्ति यानी जमीन-जायदाद की तो हमेशा पूंजी के खिलाफ खड़ी दिखाई देने वाली माकपा गर्व के साथ नंबर एक पर खड़ी है। इसके बाद 31 करोड़ की अचल जायदाद के साथ भाजपा है और फिर 25 करोड़ रुपये के साथ कांग्रेस। पार्टी फंड का ब्योरा बताता है कि इसमें कार्यकर्ताओं का योगदान मामूली होता है। 2007-08 के दौरान इनकी कुल कमाई में कार्यकर्ताओं का योगदान सिर्फ पांच फीसदी रहा। इनमें सबसे समर्पित बसपा कार्यकर्ता दिखे। बाकी सभी पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने मिला कर जितना सदस्यता शुल्क दिया, उससे छह गुना अकेले बसपायों ने दे दिया। बसपा को सदस्यता शुल्क से 20 करोड़ 50 लाख रुपये मिले, जबकि कांग्रेस को सवा दो करोड़ और भाजपा को सिर्फ डेढ़ करोड़।
Bhupinder Singh Hooda to Prove Majority By 31 October in Haryana Assembly
Chandigarh (Arun singla): Haryana Governor Jagannath Pahadia has given one week’s time to Haryana CM Bhupinder Singh Hooda to prove majority on the floor of the house.Addressing a press conference after taking oath, Bhupinder Singh Hooda said that his party had support of seven independent MLAs and one MLA of BSP had also extended his support to the Congress.When asked about Haryana Janhit Congress (BL) joining hands with the Congress, he said that the members of HJC were part of the Congress family, but somehow they had they had parted away. Now if they give unconditional support, the Congress would welcome them.



