विधायक जस्सी का गनमैन गोली लगने से घायल
डबवाली (Arun singla) पंजाब के एक विधायक के गनमैन से अचानक अपनी सर्विस रिवॉल्वर से चली गोली से वह स्वयं घायल हो गया। जिसे उपचार के लिए हरियाणा के नगर डबवाली के सिविल अस्पताल में ले जाया गया। लेकिन उसकी गंभीर हालत को देखते हुए बठिंडा रैफर कर दिया गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार विधायक हरमन्दर सिंह जस्सी दीपावली के कारण अपने गांव जस्सी बागवाली में आया हुआ था और उसका गनमैन मंगा सिंह पुत्र दर्शन सिंह गांव छतराना (पटियाला) भी साथ ही था। सूत्रों के अनुसार मंगा सिंह अपने अन्य दो साथियों के साथ गांव जस्सी बागवाली के बराड़ वैष्णों ढाबा पर रविवार रात को करीब 8 बजे खाना खाने के लिए गया था। खाना खाने के बाद जब वह अपने सर्विस रिवॉल्वर को संभाल रहा था तो अचानक रिवॉल्वर से गोली चल गई जो उसके पेट में एक साईड पर लगी। मंगा सिंह को घायल अवस्था में उपचार के लिए निकटवर्ती हरियाणा राज्य के नगर डबवाली के सिविल अस्पताल में ले जाया गया। लेकिन उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसे बठिंडा रैफर कर दिया गया। पता चला है कि इलाज के लिए उसे संगरूर ले जाया गया है। बराड़ वैष्णों ढाबा के मालिक मनदीप सिंह ने बताया कि मंगा सिंह बगैरा ने ढाबे पर खाना खाया और जब वह अपने पिस्तौल को संभालने लगा तो गोली चल गई। थाना संगत प्रभारी संदीप सिंह भाटी ने इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि मंगा सिंह जब पिस्तौल को डब में डालने लगा तो उसकी पिस्तौल बैल्ट में अटक गई जिससे पिस्तौल का टाईगर गार्ड दब गया और गोली चल गई। मामले की जांच पड़ताल की जा रही है।
बोले अजय चौटाला, कांग्रेस 30 का आंकड़ा भी नहीं छू सकेगी
डबवाली (Arun singla) राज्यसभा सदस्य तथा डबवाली विधानसभा सीट से इनेलो प्रत्याशी अजय सिंह चौटाला ने कहा कि हरियाणा में 50 से ऊपर सीटें जीत कर इनेलो अपनी सरकार बनायेगी। वे अपने डबवाली स्थित चुनाव कार्यालय में दीपावली के बाद कार्यकर्ताओं से रू-ब-रू हो रहे थे। उन्होंने कहा कि हरियाणा विधानसभा चुनावों में कार्यकर्ताओं ने जिस मेहनत से काम किया है उस मेहनत के परिणाम उन्हें जरूर मिलेंगे और इसी के चलते कांग्रेस इन चुनावों में 30 सीटों का आंकड़े को छू भी नहीं सकेगी। उन्होंने इस मौके पर दावा किया कि डबवाली विधानसभा सीट वे 10 हजार से भी अधिक मतों से जीतेंगे। उन्होंने कार्यकर्ताओं का हौंसला बढ़ाते हुए कहा कि इस बार वह सिरसा जिला की सभी पांच विधानसभा सीटों पर विजय होंगे। इस मौके पर उनके साथ उनके बेटा दुष्यन्त भी था।
इनलो सुप्रीमो और पार्टी के परधन महासचिव अजय चौटाला ने दीपावली के अगली दिन अपने तेजा खेडा फार्म हाउस पे लोगो से मुलाकात की और लोगो का हाल चल पुछा अजय और उनके पिता ने लोगो को दीपावली की बधाए भी दी इस मोके आने वाले चुनाव नातेजो पर भी चर्चा हुए
देश के सबसे लंबे फ्लाईओवर पर यातायात शुरू होने के बाद शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर शमशाबाद स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पहुंचना आसान हो जाएगा। फ्लाईओवर पर सोमवार को आवागमन शुरू होने के बाद बहुत कम समय में हवाईअड्डे तक पहुंचा जा सकेगा। इस 11.633 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर का नाम पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नाम पर 'पीवीएनआर एक्सप्रेस वे' रखा गया है। यह फ्लाईओवर शहर के मेहदीपटनम इलाके को हैदराबाद-बेंगलुरू राष्ट्रीय राजमार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग-7) और अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से जोड़ता है। 'हैदराबाद महानगर विकास प्राधिकरण' (एचएमडीए) ने 4.39 अरब रुपये की लागत से 17.2 मीटर चौड़े फ्लाईओवर का निर्माण किया है। यह फ्लाईओवर मेहदीपटनम के 'सरोजिनी देवी आई हॉस्पीटल' से शुरू होकर राष्ट्रीय राजमार्ग-7 के 'अरामघर जंक्शन' पर समाप्त होता है। एचएमडीए के अधिकारियों का कहना है कि इस फ्लाईओवर के शुरू हो जाने से हवाईअड्डा पहुंचने में लगने वाले समय में 30 से 40 मिनट की कमी आएगी। वर्तमान में लोगों को शहर के विभिन्न इलाकों से हवाईअड्डे तक पहुंचने में 45 मिनट से एक घंटे तक का समय लगता है। वर्ष 2005 में अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की नींव रखे जाने के बाद से फ्लाईओवर की परियोजना पर काम शुरू हो गया था और हवाईअड्डा शुरू हो जाने के डेढ़ साल बाद इसका काम पूरा हुआ है।
दिल्ली में लगने वाले ट्रैफिक जाम पर हर दिन लगभग दिल्लीवासियों की जेब से 10 करोड़ रुपये और सरकार के खाते से 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सेंटर फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (CTI)ने एक सर्वे में यह बात कही है। सीटीआई ने सर्वे में कहा है- दिल्ली की सड़कों पर हर दिन करीब एक हजार नई गाड़ियां उतरती हैं। सड़कों पर पहले ही जरूरत से ज्यादा भार है लेकिन हर दिन बढ़ने वाली गाड़ियों की तादाद को रोकने का उपाय एक्सपर्टस को एक ही नज़र आता है और वह है एक ऐसा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम जिससे प्राइवट गाड़ियों वाले लोग भी इस्तेमाल कर सकें। सीटीआई के चीफ ट्रस्टी पंकज शर्मा ने कहा, सर्वे से पता चला है कि 60 लाख रजिस्टर्ड गाड़ियों में से एक तिहाई गाड़ियां सड़कों पर हैं। इनमें से हर गाड़ी पर औसतन 1.6 लीटर (2.5 लीटर कारों पर, 0.75 लीटर टू वीलर्स)ईंधन खर्च होता है। इस हिसाब से प्रतिदिन करीब 30 लाख लीटर ईंधन खर्च होता है। सर्वे के मुताबिक ट्रैफिक जाम के कारण एक व्यक्ति हर दिन 90 मिनट खर्च करता है और हर दिन करीब 10 करोड़ रुपये का ईंधन खर्च किया जाता है। चूंकि पेट्रोल-डीजल पर 15% की सरकारी सब्सिडी है इसलिए ईंधन की सब्सिडी पर सरकार के खाते से भी हर दिन 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सीटीआई ने सर्वे में दिल्ली की उन जगहों की भी पहचान की जहां सबसे ज्यादा ट्रैफिक जाम के कारण अक्सर स्थिति बेहद खराब रहती है। ये जगह हैं- खानपुर से डिफेंस कॉलनी, एमबी रोड, मूलचंद से नेहरू प्लेस, विकास मार्ग, एनएच-24, केशवपुरम से अशोक विहार, रोहतक रोड से पंजाबी बाग वाया जखीरा और ईदगाह से सब्जी मंडी। सर्वे टीम इन जगहों पर अलग-अलग समय में गाड़ियों से गुजरी और पता लगाया कि भीड़भाड़ के समय और ट्रैफिक जाम की स्थिति में औसतन कितना ईंधन खर्च होता है।
फाइव स्टार होटलों के आलीशान शौचालयों से लेकर घर-घर की जरूरत बन चुका टॉयलेट पेपर पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि साधारण कागज के लिए जितने पेड़ कटते हैं वहीं मलमल की तरह मुलायम टॉयलेट पेपर के लिए उससे कहीं अधिक संख्या में पेड़ों की कटाई होती है। पर्यावरणविदों का कहना है कि पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए टॉयलेट पेपर के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के साथ ही शौचालयों में इसके विकल्प पेश किए जाने चाहिए नहीं तो आने वाले समय में यह पर्यावरण विनाश के एक प्रमुख कारकों में शामिल होगा। पर्यावरण से जुड़े प्रतिष्ठित संगठन टेरी के वैज्ञानिक डॉ. सुनील ने इस संबंध में कहा कि भारत जैसे विशाल देश में टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल हतोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि इससे बहुत अधिक संख्या में पेड़ों की कटाई होगी और पर्यावरण संतुलन बिगड़ेगा। पर्यावरणविदों की यह भी शिकायत है कि भारत में इस संबंध में जागरूकता नहीं के बराबर है। हालांकि उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों में रिसाइक्ल्ड पेपर से बने टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यह प्रक्रिया भी आसान और पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। रिसाइक्ल्ड पेपर से पहले स्याही को साफ करके फिर उसे प्रोसेस किया जाता है लेकिन स्याही को साफ करने की इस प्रक्रिया की अपनी चुनौतियां हैं। इस प्रक्रिया में पेपर को ब्लीच करने के लिए क्लोरीन इस्तेमाल की जाती है। क्लोरीन आधारित रसायन पेपर फाइबर के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं और इससे डाइऑक्सिन और ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे विषैले पदार्थ निकलते हैं। डाइऑक्सिन लोगों में कैंसर, सीखने की क्षमता को प्रभावित करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता को घटाने और मधुमेह जैसी बीमारियों को जन्म दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण संगठन ग्रीन पीस ने पिछले दिनों अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि कोटोनेल तथा स्कॉट जैसे दो प्रमुख अमेरिकी टॉयलेट पेपर ब्रांडों के लिए 22 फीसदी पल्प कनाडा के उन जंगलों से आया जहां कुछ पेड़ दो सौ साल तक पुराने हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि टॉयलेट पेपर के लिए न केवल पेड़ों की कटाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा है बल्कि इससे उन जीव जंतुओं के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया है जो इन जंगलों में सदियों से रहते आ रहे हैं। टॉयलेट पेपर की शुरुआत की कहानी बेहद दिलचस्प है। इतिहास बताता है कि सबसे पहले 1391 में चीन में महाराजाओं के इस्तेमाल के लिए टॉयलेट पेपर बनाया गया और उसके कई सदियों बाद 1857 में जोसेफ गेटी ने सबसे पहला फैक्ट्री निर्मित टॉयलेट पेपर बाजार में पेश किया। इसके बाद 1871 में जेथ वीलर ने टॉयलेट पेपर के रोल का पेटेंट कराया। टॉयलेट पेपर के पेटेंट को लेकर भी कई अदालती लड़ाइयां लड़ी गईं और अंतत: 1894 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ओलिवर हावलेट हिक्स के पेटेंट दावे को सेथ वीलर के पक्ष में खारिज कर दिया। टॉयलेट पेपर का पश्चिमी देशों की संस्कृति में क्या स्थान है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां 26 अगस्त को टॉयलेट पेपर डे मनाया जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि 1880 से पहले टॉयलेट पेपर के स्थान पर लोग पहले पत्तों, डंडियों, रेत और कपड़े आदि का इस्तेमाल किया जाता था। लोग मल साफ करने के लिए प्राचीन समय में किन चीजों का इस्तेमाल करते थे, यह उनके पर्यावरण पर निर्भर करता था। जैसे दुनिया के उत्तरी हिस्से में रहने वाले लोग, विशेषकर एस्किमो गर्मी के मौसम में टुंड्रा घास तथा सर्दियों में बर्फ का इस्तेमाल करते थे। इसी प्रकार तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोग सीपों और नारियल के पुराने खोलों तथा अमेरिका के औपनिवेशक काल में लोग भुट्टे की खोखली डंडी, उत्तर भारत में गन्ने के लंबे छिल्के आदि का प्रयोग करते थे। यह जानकारी कुछ हास्यास्पद लग सकती है लेकिन प्राचीन रोम में इस काम के लिए एक लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था जिसके एक सिरे पर नमकीन पानी में डूबा स्पंज का टुकड़ा लगा होता था। गौरतलब है कि लगभग पूरी दुनिया में लोग एक दूसरे से दायां हाथ ही मिलाते हैं और दुनिया के पूर्वी हिस्से में लोग खाना खाने के लिए दाएं हाथ का इस्तेमाल करते हैं। बायां हाथ मिलाना जहां असभ्यता की निशानी माना जाता है वहीं छोटे बच्चों को बाएं हाथ से खाना खाने से हतोत्साहित किया जाता है और यह बात अधिकतर संस्कृतियों का हिस्सा बन चुकी है - इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि बाएं हाथ का इस्तेमाल मल साफ करने के लिए किया जाता है। यह साफ है कि प्राचीन काल के रीति रिवाजों पर 21वीं सदी में लौटना संभव नहीं है लेकिन टॉयलेट पेपर का विकल्प तलाशने की जरूरत है।

